International Journal of Jyotish Research

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ISSN: 2456-4427, Impact Factor: RJIF 5.11

International Journal of Jyotish Research

2017, Vol. 2 Issue 1, Part A
ज्योतिर्विज्ञान की दृष्टि से नेत्र रोग की उत्पत्ति व विश्लेषण
Author(s): Deepti Tyagi
Abstract: नेत्र शरीर का वह अंग है जो विभिन्न उद्देश्यों के लिए प्रकाश से प्रतिक्रिया करता हैं | यह मानव के शरीर की एक इन्द्रिय हैं | आँखें अत्यंत जटिल ज्ञानेन्द्रियाँ हैं | आँख या नेत्रों के द्वारा हमें वस्तु का दृष्टिज्ञान होता है। दृष्टि एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें प्रकाश किरणों के प्रति संवेदिता, स्वरूप, दूरी, रंग आदि सभी का प्रत्यक्ष ज्ञान समाहित है। मानव शरीर में दो आँखे होती हैं | जो दायीं-बायीं दोनों ओर एक-एक नेत्र कोटरीय गुहा में स्थित रहती है। ये लगभग गोलाकार होती हैं तथा इन्हें नेत्रगोलक कहा जाता है। आँखों में फोटो रिसेप्टर होते हैं | जो कि प्रकाश को विद्युत सिग्नल में परिवर्तित करता हैं | फिर यह सिग्नल ऑप्टिक स्नायु मस्तिष्क में पहुँचता हैं और व्यक्ति को दृष्टि की अनुभूति होती हैं | दृष्टि वह संवेदन है, जिस पर मनुष्य सर्वाधिक निर्भर करता है। इसके सबसे गहरे भाग में एक गोल छिद्र (फोरामेन) होता है, जिसमें से होकर द्वितीय कपालीय तन्त्रिका (ऑप्टिक तन्त्रिका) का मार्ग बनता है। नेत्र के ऊपर व नीचे दो पलकें होती हैं। ये नेत्र की धूल के कणों से सुरक्षा करती हैं। नेत्र में ग्रन्थियाँ होती हैं। जिनके द्वारा पलक और आँख सदैव नम बनी रहती हैं। मनुष्य में अनेक प्रकार के नेत्र रोग होते हैं जैसे कि जन्म से अँधा होना, मोतियाबिंद होना, रात में दिखाई न देना, कभी किसी बिमारी से रोशनी चली या कम हो जाती है। ज्योतिर्विज्ञान में जन्मजात रोग के अलावा वात, पित्त व कफ से उत्पन्न होने वाले रोग शारीरिक एवं मानसिक रोगों के योग बतलाये गये हैं |
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How to cite this article:
Deepti Tyagi. ज्योतिर्विज्ञान की दृष्टि से नेत्र रोग की उत्पत्ति व विश्लेषण. Int J Jyotish Res 2017;2(1):09-12.
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